नमस्कार (णमोकार) महामंत्र जिससे हर समस्या का निदान

महामंत्र नमस्कार या णमोकार की साधना से केवल जैन ही नहीं सभी धर्मवलम्बी लाभ उठा सकते हैं | जैसे सूर्य वैसे ही यह मंत्र प्रत्येक मानव के लिए सर्व लोकोपकारी हैं | यह बहुत ही अलौकिक शक्तियों से युक्त महामंत्र हैं | विश्व के प्रत्येक धर्म में चित्त की निर्मलता और आचरण की विशुद्धता को स्वीकार किया गया हैं | इसके लिए सभी धर्मो ने एक अत्यंत संक्षिप्त , पूर्ण एवं परम शक्तियुक्त साधन के रूप में मंत्रो को अपनाया हैं | मंत्रो में भी एक महामंत्र होता हैं | वैदिक परंपरा में गायत्री महामंत्र , बौद्ध परंपरा में त्रिसरण महामंत्र , ईसाई , मुस्लिम और सिक्ख धर्म में इबादत और ईशनाम स्मरण (प्रार्थना ) को महामंत्र की संज्ञा दी गई हैं | जैन धर्म में णमोकार महामंत्र को अनादि सिद्ध माना गया हैं | इस महामंत्र की संरचना इतनी महत्वपूर्ण और आलौकिक है कि इस मन्त्र में किसी व्यक्ति विशेष की स्तुति नहीं हैं | इसमें तो आत्मा से परमात्मा की ओर बढ़ने वाले उन विशिष्ट साधकों का उल्लेख हैं , जो गुणों के पुंज (शक्ति ) हैं | यह मंत्र पूर्णतः शुद्ध एवं सात्विक हैं | इस मंत्र के जप से एक प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती हैं , जो कर्म के मल को जलाकर नष्ट कर देती हैं , जिसमे आत्मा विशुद्ध बन जाती हैं और हमारे आसपास उपस्थित ऋणात्मक तरंगो का नाश कर देती हैं |

णमोकार महामंत्र

अन्य मंत्रो में देवी और देवताओं की आराधना की जाती हैं , लक्ष्मी की उपासना से लक्ष्मी की प्राप्ति , सरस्वती की उपासना से विद्या की प्राप्ति , दुर्गा , बगलामुखी आदि शक्तियों की उपासना करने से शक्ति की प्राप्ति होती हैं | यह सभी मंत्र अपने अपने इष्ट देवी-देवताओं की सीमित शक्ति तक आबद्ध रहते हैं , परंतु इस महामंत्र में किसी विशेष देवी -देवता की उपासना नहीं हैं , अपितु गुणों का अभिकीर्तन हैं | इस महामंत्र में पैतीस अक्षर हैं | कहा जाता हैं कि एक एक अक्षर के एक-एक हजार देव हैं | इस प्रकार पैतीस अक्षरों के पैतीस इष्टायक हैं | इसीलिए मंत्र की आलौकिक शक्तियों का भंडार हैं | इस महामंत्र की साधना से साधक को आलौकिक एवं पारलौकिक , शारीरिक एवं मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं | इस महामंत्र में पांच पद , पैतीस अक्षर ,अड़सठ वर्ण हैं | इन सभी वर्णो का अपना विशिष्ठ अर्थ हैं , विशिष्ठ शक्ति है तथा आलौकिक ऊर्जा उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता हैं |मंत्र का अर्थ है मनन , विज्ञान , विद्या और ज्ञान | मनन कहते हैं बार बार विचारने को | मंत्र शक्ति से मन को अपने मनोनुकूल डाला जा सकता हैं |

||शांति, शक्ति और मोक्ष का अद्वितीय मंत्र। || || हर बाधा को पार करने का मार्ग ||

णमोकार महामंत्र से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :

  • ग्रंथियों में स्फूर्ति आने से वे क्रियाशील हो जाती है| जिस प्रयोजन के लिए जो मंत्र होते हैं , वह उसी प्रकार की ग्रंथियों को जगाते है | इन ग्रंथियों की क्रियाशीलता से ही साधक को विभिन्न प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं , जो दूसरों को चमत्कार दिखाई देती हैं | परंतु वास्तव में यह मंत्रो की वैज्ञानिक प्रक्रिया का परिणाम है |
  • जिस तरह बीज में वृक्ष फल आदि सूक्ष्म रुप में विद्यमान रहते है और समय पाकर वह व्यक्त रूप में दृष्टिगोचर होने लगते हैं , उसी प्रकार बीजाक्षर में भी सूक्ष्म रूप में शक्ति रहती है |
  • उस शक्ति के विकास के लिए साधना रुपी जल और खाद की आवश्यकता होती है | मंत्र सिद्धि के मूल में बीज मंत्र का ही विशेष महत्व है | जब मंत्रों की शक्ति बहुगुण करना होता है शीघ्र सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा हो , तो बीज मंत्रो का ही सहयोग अनिवार्य रहता है | विभिन्न देवी -देवताओं के बीजाक्षर मंत्र अलग अलग होते है |
  • पहला और समस्त में संभव से व्यापक शब्द “ॐ” हैं , जो महाबीज हैं , क्योंकि यह अन्य सबका और सभी संयुक्त अक्षरों का मूल है | इस प्रकार बीज मंत्रो में ध्वनि शक्ति होती है अथवा शक्ति रूपा होती है और साधक को शक्ति का ही प्रसाद देते है | अतः कलयुग में बीज मंत्र ही मानव कल्याण में हर प्रकार से सहायक होते हैं |
  • णमोकार मंत्र की संरचना अलौकीक है | यह पूर्ण विशुद्ध आध्यात्मिक मंत्र है |इस मंत्र की आस्था श्रद्धापूर्ण जाप से एक विशिष्ट ऊर्जा उत्पन्न होती है , जो हमे लौकिक सफलताएँ तो देती ही हैं , भव-मुक्ति के लिए भी आधार भूमि बनाती हैं |
  • मैं इस मंत्र को मन , वचन ,कर्म की समग्रता से नमस्कार करता हूँ, क्योंकि यही केवल मात्र एक मंत्र हैं जिसमे उन सभी आत्माओं को जो अपने को शुद्ध कर चुकी हैं अथवा शुद्ध करने के प्रयत्न में लगी हुई हैं नमस्कार किया गया हैं। इसे जैनो के सभी सम्प्रदाय दिगम्बर , श्वेताम्बर स्थानकवासी आदि श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक जपा करते हैं |
  • एक णमोकार मंत्र को तीन श्वासोच्छ्वास में पढ़ना चाहिए | पहली श्वास में णमो आइरियाणं , उच्छ्वास में णमो उवझायाणं और तीसरी श्वास में णमो लोए और उच्छ्वास में सहूंण बोलें |
    मंत्र के साथ श्रद्धा की शर्त अनिवार्य रूप से जुडी हुई हैं | जब तक अश्रद्धा का पर्दा रहेगा , हम महामंत्र के अमृत का स्पर्श नहीं कर पाएंगे | यदि आपके कण-कण में, रोम -रोम में णमोकार मंत्र रचा -बसा हैं , आपको उस पर अटल श्रद्धा हैं , तो वह किसी भी क्षण अपना प्रभाव दिखा सकता हैं |
  • श्रद्धा के साथ आवश्यक है भावना की शुद्धि |णमोकार मंत्र जपते समय मन में बुरे विचार , अशुभ संकल्प और विकार नहीं आने चाहिए। मन की पवित्रता से हम मंत्र का प्रभाव शीघ्र अनुभव कर सकेंगे। मन जब पवित्र होता हैं , तो उसे एकाग्र करना सहज होता हैं। मंत्र पाठ नियमित और निरंतर होने से यह चमत्कारी फल पैदा करता हैं।

इस मंत्र के सम्बन्ध में यह श्लोक प्रसिद्ध हैं :

||अनादि मूल मंत्रोयं , सर्व विघ्न विनाशक:|मंगलेषु च सर्वेषु , प्रथमं मंगलं मत: ||  

णमोकार मंत्र समस्त वर्णों का प्रतिनिधि मंत्र हैं | स्वर तथा व्यंजनमय सारी मातृका शक्तियां उसमें हैं | ध्वनियों की सम्पूर्ण ऊर्जा इस महामंत्र का सस्वर जाप या उच्चारण करते -करते शरीर में अपेक्षित रंग और आकृतियों की अवतारणा होगी | ध्वनि तरंग धीरे धीरे विद्युत तरंग , रंग और आकृति में ढलेगी ही। इसके बाद भक्त स्वयं की पूर्णता का साक्षात्कार कर सके , ऐसी क्षमता की स्थिति में पहुंच जाएगा।
णमो अरिहंताणं पद का श्वेत रंग आपको रोगों से बचाता हैं और आपकी पाचन शक्ति को ठीक करता हैं। मानसिक निर्मलता और संरक्षण शक्ति भी इसी पद के श्वेतार्ण से प्राप्त होती हैं। णमो सिद्धाणं का लाल वर्ण शक्ति भी इससे ही बढ़ती हैं। णमो आइरियाणं का पीला रंग संयम और आत्मबल का वर्धक है। णमो उवज्झायाणं का नीला रंग शरीर में शक्ति और समन्वय पैदा करता है। हृदय , फेफड़े , पसलियों को भी यह रंग ठीक करता है। मो लोय सव्वसाहूणं का काला रंग शरीर की निष्क्रियता और अकर्मण्यता को दूर करता है। कर्म दमन और संघर्ष शक्ति इस वर्ण में है।

रंगों के माध्यम से मंत्र में उतरना और स्वयं को निरोग बनाने का अर्थ है – आकृति और दृष्टी मूलक प्रयोग , नेत्रेन्द्रिय परक पद्धति। आयुर्वेद चिकित्सा का आधार वात , पित्त और कफ हैं , इनके आधार पर कफ का आसमानी रंग , वात का पीला रंग और पित्त का लाल रंग। लाल रंग की शरीर में कमी के कारण सुस्ती , अधिक निद्रा , भूख की कमी , कब्ज और पतले दस्त आते है। रक्त का रंग लाल ही है। आसमानी रंग की कमी से फेफड़ों में सूजन , थकान और चक्कर आते हैं। पीले रंग की कमी से मस्तिष्क में शिथिलता मंदाग्रि और उदासीनता आती है। उक्त रंगों की माला लेकर पंचपरमेष्ठी का जाप करने से अवश्य ही लाभ होगा।

णमोकार महामंत्र का योग के साथ भी गहरा संबंध है । योग साधना के द्वारा हम शरीर और मन को सुस्थिर करके शांत चित्त से पंच परमेष्ठी की आराधना कर सकते है। णमोकार महामंत्र का प्रत्येक अक्षर अक्षय शक्तियों का भंडार है। इसके उद्घाटन और तादात्मय की स्थिति योग द्वारा ही जीव में संभव है। यह सृष्टि पंचभूतों से निर्मित है। ये पांच तत्व जल , अग्नि , वायु , पृथ्वी और आकाश हैं।

इन्हीं पांच तत्वों के अनुपातिक सम्मिश्रण से समस्त प्राणी जगत बना हैं। जब यह अनुपात बिगड़ता है , अर्थात कोई तत्व कम या अधिक हो जाता हैं , तब हम अस्वस्थ (रोगी) हो जाते हैं और हमारा शरीर और मन तरह तरह से अवांछित आचरण करने लगता है। जब धीरे धीरे हम फिर से प्राकृतिक अनुपात में लौट आते हैं , तो स्वस्थ , पुष्ट एवं प्रसन्नचित्त हो जाते हैं | सुस्पष्ट है कि सम्पूर्ण महामंत्र में प्राकृति के पांचो तत्व भरपूर मात्रा में हैं। उनका उपयोग आवश्यकतानुसार किया जा सकता हैं।

सम्पूर्ण मंत्र में पृथ्वी तत्व -४ , जल तत्व – ५ , अग्नि तत्व -२, वायु तत्व -७ और आकाश तत्व -१२ हैं। सबसे अधिक संख्या आकाश तत्व की है। आकाश तत्व आध्यात्मिक उन्नयन में परम सहायक होता है और निरंतर शारीरिक तथा मानसिक पवित्रता संचारित करता है। यह सभी पदों में हैं। प्रथम और अंतिम पद में इसकी संख्या ३-३ है। वायु तत्व की पूरे मंत्र में कुल संख्या ७ है। यह तत्व सूक्ष्म और व्यापक है। शरीर में वायु तत्व की रक्षा और पूर्ति करता है। जल तत्व आकाश और वायु की अपेक्षा स्थूल है और प्रवाह तथा शमन का प्रतीक है। अग्नि तत्व शरीर में तेज , ऊष्मा सहनशीलता और दृढ़ता का प्रतीक है। इस तरह णमोकार मंत्र की महिमा अपार है।

यह मंत्र सिद्धिदायक है। किसी भी समय इसका ध्यान कर सकते है। इनके उच्चारण में कोई बदलाव हो जाए , तो कोई दुष्परिणाम नहीं होते। णमोकार से सब जीवों का कल्याण होता है।

|| णमोकार महामंत्र, हर समस्या का निदान ||  

मंत्र वह शक्ति और विद्या हैं जिससे शक्ति का उद्भव होता हैं | जब मन की चंचल वृत्तियाँ एकाग्र हो जाती है है और देव- जगत की शक्ति की तरह कार्य करने लगती है | मंत्र द्वारा यह कार्य सरलतापूर्वक हो जाता हैं | मंत्र से छिन्न -भिन्न मानसिकता वृत्तियाँ एक बिंदु पर लाई जाती हैं , तब वह शक्ति का स्त्रोत बन जाती हैं | मन इन्द्रियों को चलाने वाला है और अतः मंत्र द्वारा इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की जाती है | बुद्धि मन की गुरु है , मन में बुद्धि अनुसार सात्विक वृत्तियों का आगमन होता हैं | मंत्र की सूक्ष्म शक्तियों से इनका सीधा संपर्क रहता हैं | मंत्र से प्राणो पर विजय प्राप्त की जाती हैं | प्राण हमारी जीवन संजीवनी शक्ति है |
मंत्रो के अभ्यास से ही नाड़ियां शुद्ध होती है और कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होती है | जिसने अपने प्राणो में जाग्रति उत्पन्न कर ली हैं, उसके चारो ओर प्रकाश ही प्रकाश रहता हैं | जीवन का नव निर्माण करने वाली इस महाशक्ति पर मंत्र शक्ति का राज्य स्थापित हो जाता हैं | प्राण शक्ति पर विजय प्राप्त कर साधक शक्तियों का पुंज बन जाता हैं | उसके लिए साधारण कार्य दूसरों को असाधारण और चमत्कार दृष्टिगोचर होते है | वास्तव में यह मंत्र शक्ति द्वारा गणों पर अधिकार का ही परिणाम हैं | हमारे सूक्ष्म शरीर में अनेक प्रकार की शक्तियां विद्यमान हैं | इनको जगाकर ही हम असाधारण कार्यों के सम्पादन की क्षमता वाले हो जाते हैं | यह प्रत्यक्ष नियम हैं | सूक्ष्म जगत में सूक्ष्म की ही पहुंच संभव हो सकती हैं | स्थूल वस्तुओं का प्रवेश निषिद्ध है | शब्द (ध्वनि) मंत्र में एक शक्ति छिपी हुई हैं और वह वर्ग ध्वनियों के अनुसार भिन्नता रखती है | शब्द ध्वनियों , पदार्थों की सृष्टि से पहले उत्पन्न हुए हैं | शब्द पहले हैं और अर्थ बाद में | यह वही शब्द ध्वनि -लय – नाद है , जो कि सूक्ष्म वस्तुओं से लेकर विशालतम वस्तुओं के निर्माण में कार्यरत है | मंत्र का आधार शब्द इसलिए माना गया है कि यह अन्य तत्वों की अपेक्षा शक्तिशाली है | शास्त्रों ने इसकी शक्ति और सामर्थ्य को देखकर इसे ब्रह्मा ही निरूपित किया | वास्तव में शब्द में अपार सामर्थ्य है | जब शब्दों का उच्चारण होता है , तो उनसे कम्पन होते हैं | यह कंपन ब्रह्मांड यात्रा की तैयारी करते हैं और ईश्वर तत्व के माध्यम से परिक्रमा को समाप्त कर लेते हैं | इस यात्रा में अनुकूल कम्पनों का एक पुंज-सा बन जाता हैं और अपने केंद्र तक लौटते – लौटते वह अपनी शक्ति को कई गुना बढ़ा लेते हैं | यह कार्य इतनी तीव्र गति से हो जाता है कि साधक को इसका अनुभव भी नहीं हो पाता है कि शब्दों (मंत्रो) के उच्चारण मात्र से यह चमत्काअर कैसे उत्पन्न हो रहे है | मन्त्र से सम्बंधित यौगिक ग्रंथियों की सोइ हुई शक्तियाँ जाग्रत होती हैं |

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