मंत्रो का वैज्ञानिक गठन
मंत्रो में सूक्ष्म ध्वनि होती है ध्वनियों के समूह को मंत्र कहते है | वैज्ञानिकों ने ध्वनि तरंगो पर परिक्षण किये है ऊँची कम्पन वाली ध्वनि का प्रयोग चिकित्सा में उपचार के लिए किया जा रहा है | अब प्रत्येक ध्वनि का चित्र लेना संभव हो गया है | मन्त्र उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि कम्पनों से रोग निवारण विष उतरना उन्मादं दूर करना जैसे प्राचीन उदाहरण भी सत्य माने जाने चाहिए |
मंत्रो का निर्माण का भी एक स्वतंत्र विज्ञान है | मंत्र अर्थपूर्ण तो होते है और वह उत्तम शिक्षाओं के साथ ही मनोवपयोगी सिद्धांतों से ओत प्रोत भी रहते है , परन्तु उनसे भी महत्वपूर्ण उनमें भरी शक्तियाँ है , क्योंकि वेदों के प्रत्येक मंत्र का गठन कुछ ऐसे ढंग से किया गया है कि उनका सीधा प्रभाव हमारी सूक्ष्म ग्रंथियों शटचकों और सातों शक्ति केंद्रों पर पड़ता है जिससे सूक्ष्म जगत (पिण्ड ) के शक्ति केंद्र जाग्रत होते है | मन्त्रों के जप- तप , उपासना से शब्द उनसे सम्बंधित यौगिक ग्रंथियों को गुदगुदाते है | सोई हुई शक्तियों को जाग्रत करते है | जिस उद्देश्य या प्रयोजन के लिए मंत्र होते है , वह उसी प्रकार की ग्रंथियों को जमा कर उन्ही पर वह मंत्र- शब्द आघात करते है | इन ग्रंथियों की क्रिया शीलता से ही भक्त , साधक को विभिन्न प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है जो दूसरों को चमत्कार दिखाई देती है | परन्तु वासतव में वह मन्त्र शब्दों की वैज्ञानिक प्रक्रिया ध्वनि का ही परिणाम है |
विदेशी विचारक ब्लैक बुरण ने इस तथ्य की पुष्टि करते हुए लिखा है कि ‘संस्कृत’ भाषा के अक्षरों की युक्ति पूर्ण गठन से अनेक बार जादू का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है |
मंत्रों का वैज्ञानिक आधार
मंत्रों का एक स्वतन्त्र विज्ञान है जिसका आधार वैज्ञानिक तथ्य है। साधारण रूप से इसे यॐ समझा जा सकता है कि जड़ और चेतन, दो प्रकार का संसार होता है। यह जगत स्थूल और सूक्ष्म दो भागों में बंटा हुआ है। हमारे नेत्रों से जो कुछ दिखाई देता है वह स्थूल है। जो वस्तु स्थान चाहती है, जिसका वजन और नाप-तौल होता है, उसे विज्ञान की भाषा में स्थूल कहते हैं। जिसको हम नेत्रों से देख नहीं सकते जिनका नाप-तौल और वजन नहीं • होता, जिसे स्थान की आवश्यकता नहीं होती वह सूक्ष्म कहलाता है। शरीर स्थूल है और मन सूक्ष्म है। "मंत्र" का आधार शब्द है। शब्द को मंत्र का आधार इसलिए माना गया है कि वह अन्य तत्वों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है। शास्त्रों में इसकी शक्ति और सामर्थ्य को देखकर इसे "ब्रह्म" ही निरुपित किया है। वास्तव में शब्द में अपार सूक्ष्म शक्ति विद्यमान है। जब शब्दों (मंत्रों) का उच्चारण होता है तो उसमें कंपन होते हैं। ये कपन ईथर तत्व के माध्यम से कुछ ही क्षणों में ब्रह्माण्ड की परिक्रमा पूर्ण कर लेते हैं।
मन में हजारों लाखों तरह के भिन्न भिन्न विचार भरे रहते हैं और असंख्य विचार भरे जाने की गुंजाईश रहती है, फिर भी उसमें स्थान की कमी नहीं रहती है। स्थूल वस्तुओं की शक्तियाँ सीमित हैं किन्तु शरीर में सूक्ष्म प्राण रहने के कारण उसमें असंख्य प्रकार की गतिविधियाँ होती रहती हैं। जब शरीर से प्राण अलग हो जाता है तो वह अपने सर्वव्यापी तत्व (परमपिता परमेश्वर) में मिल जाता है और शरीर नष्ट होने लगता है। स्थूल से सूक्ष्म अति शक्तिशाली होता है। जब कोई वस्तु स्थूल से सूक्ष्म बनती है तो वह अति शक्तिशाली होती है। जैसे- जल से अधिक जल की वाष्प अधिक शक्तिशाली होती है, जिससे सैकड़ो टन की रेलगाड़ी के डिब्बे खींचे जाते हैं। अग्नि का सूक्ष्म रूप विद्युत है, जिससे बड़े-बड़े कारखाने आदि चलाये जाते हैं और अंधकार को उजाले में परिवर्तित किया जाता है।
शब्दों (मंत्रों) से उत्पन्न कंपनों का संयोग (मिलन) अनुकूल कंपनों से होता है। अनुकूलता में एकता का सिद्धान्त प्राकृतिक है। इन कंपनों का एक पुज अनुकूलता सा बन जाता है और अपने केन्द्र तक लौटते- लौटते वह अपनी शक्ति को कई गुणा बढ़ा लेते हैं। ये कार्य इतनी तीव्र गति से हो जाता है कि भक्त को इसका अनुभव भी नहीं हो पाता है कि शब्दों (मंत्रों) के उच्चारण मात्र से यह चमत्कार कैसे उत्पन्न हो रहे हैं।
मंत्रों की विभिन्न सूक्ष्म शक्तियाँ
मंत्रों में अद्भुत शक्ति एवं सामर्थ्य होती है। मंत्र विद्या का आविष्कार, सर्वप्रथम भारत में ऋषियो दभुत शक्ति से साक्षात्कार कर अनुभूत किया गया था। इन पर सनातन हिन्दुओं को अटूट श्रद्धा और विश्वास है क्योंकि इनको मंगल-कल्याण करने वाला कहा रगया है। वैदिक धर्म ने ही नहीं, भारत के अन्य धर्मों ने भी इनकी महत्ता को स्वीकार किया है। जैन धर्म के मंत्रों के द्वारा अभिषेक किया जाता है। बौद्ध धर्म में मंत्रों के द्वारा माँ तारा र की पूजा होती है। इसी प्रकार से मुसलमानों के अनुसार नमाज में भी मंत्र होते हैं और वह की कुरान की भाषा के स्वरों को महत्वपूर्ण मानते हैं। गिरजाघरों में भी मंत्रों की ध्वनि सुनाई देती है। ईसाई धर्म के मंत्र विशेषज्ञ रोगी के पास बैठकर रोगोपचार करते हैं। उनके उपचार का माध्यम कुछ मंत्र पाठ सा होता है। मंत्रों का उपयोग कुछ अंशों में सभी धर्मों में होता है परन्तु भी उसका आरम्भ भारत में हुआ था क्योकि वेद संसार का सबसे प्राचीनतम् ग्रंथ है। बीज मंत्रो में सूक्ष्म शक्ति होती है। इसकी शक्ति को आज वैज्ञानिक भी स्वीकार कर रहे हैं। विभित्र मंत्रों में विभित्र सूक्ष्म शक्तियाँ होती हैं। क्योंकि ऋषियों ने प्रत्येक मंत्र का गठन कुछ इस ढंग से किया है कि उनका प्रभाव हमारी मानसिक व आत्मिक शक्तियों और सूक्ष्म जगत् पर पड़ता है। हमारे सूक्ष्म शरीर में जो विभिन्न शक्तियों के केन्द्र हैं, उन यौगिक ग्रंथियों पर वह मंत्र गुदगुदाते हैं, उनकी सोई हुई शक्तियों को जगाते है, उनमें स्फूर्ति आने कोसे वह क्रियाशील हो जाते हैं। जिस प्रयोजन के लिए जो मंत्र होते हैं, वह उसी प्रकार की न ग्रन्थियों को जगाते हैं, उन्हीं पर मंत्र आघात करते हैं। इसलिए इन्हें ब्रहा भी कहा जाता है। शब्दों का कभी नाश नहीं होता। वैज्ञानिकों ने भी सिद्ध कर दिया है कि हमारे द्वारा उच्चारित, शब्द आकाश में घूमते रहते हैं और अपनी जीति के कम्पनों के साथ मिलकर संगठित सूक्ष्म शक्ति द्वारा अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं। वेदों में कहा भी है 'शब्दों नित्य:' मंत्रों का विधिवत उच्चारण करने वाले जानते हैं कि उनके पाठ में किस प्रकार की त्र प्रसत्रता, उल्लास, स्फूर्ति, आनन्द का प्रस्फुरण होता है। भित्र-भिन्न मंत्रों से भिन्न प्रयोजनों में लाभ होता है। हमारे ऋषि-मुनि मानव के अंतिम लक्ष्य मृत्य का भी समाधान महामृत्युंजय जाप) दे गये हैं।
मंत्र की शक्ति प्राप्त करने के उपाय
मंत्र-शक्ति प्राप्त करने के लिए मानव में दृढ़ता , इच्छा शक्ति , अटूट श्रद्धा , भवना-शक्ति होना परम आवश्यक है। इच्छा, जन द्वारा परिष्कृत दृढ़ निश्चय का बरे रूप धारण कर लेती है तब वह संकल्प कहलाती है। निना है मैं के किसी क्रिया का आरम्भ नहीं होता है। संकल्प द्वारा मनुष्य की सभी शक्तियाँ जागृत हो जाती हैं। जिस प्रकार सूर्व की बिखरी हुई किरणों से कपड़े पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु जब उन्हें आतश शीशे (बिल्लोरी ग्लास) से एकत्रित कर लिया जाता है तो वह कपड़े को जला देती हैं। इसी प्रकार से जब मनुष्य अपने मन को सब तरफ से हटाकर एक ही कार्य (लक्ष्य) क पूर्ति में लगा लेता है तो उसका मनोरथ सफल होता है। संकल्प कर लेना मानो अपर्न शक्तियों को एकाग्र कर लेना है। संकल्प सुप्त शक्तियों को जगाने का माध्यम है। जिस तरह विस्फोटक पदार्थ स्वयं नहीं फूटते, अग्नि के सहयोग से ही शक्ति विकसित होती है। संकल्प विद्युत है जो प्राप्त शक्तियों के अणु-अणु में गति लाने की सार्मथ्य रखती है।
संकल्प का इच्छा शक्ति से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इच्छा शक्ति की कमी ही दुर्भाग्य का दूसरा नाम है। अपने सौभाग्य की वृद्धि के लिए इच्छा का विकास आवश्यक है। आप में सब कुछ है। आवश्यकता इस बात की है कि आप अपनी असीम शक्तियों का अनुभव करे और उन्हें मंत्रों के माध्यम से जाग्रत करने का प्रयत्न करें। प्रबल इच्छा शक्ति और दृढ़ संकल्प इन सूक्ष्म शक्तियों को जाग्रत करते हैं, जिन्हें हम मनोकामनाएँ पूर्ण होना कहते हैं।
साधना में श्रद्धा से निरन्तर लगे रहने से विशिष्ट लाभ का वैज्ञानिक आधार है। जिस मंत्र की साधना साधक कर रहा है, जिस मंत्र की साधना जिन लाखों साधकों द्वारा की जाती है या की जा चुकी है, उसकी सूक्ष्म शक्ति कम्पन के रूप में आकाश में विचरण करती रहती हैं। जब साधक के शब्द (मंत्र) कम्पन आकाश में पहुँचते हैं तो उस सजाति के शब्द (मंत्र) कम्पन उनके चारों और एकत्रित हो जाते हैं और ब्रह्माण्ड भ्रमण से लौटते हुए उन शब्द कम्पनों का अच्छा संगठित समूह उनके साथ रहता है। जिसका अनुकूल प्रभाव साधक के सूक्ष्म शरीर (अन्तःकरण) पर पड़ता है। इसका अर्थ यह है कि ऋषियों की पूर्व साधनाओं का प्रभाव भी साधक के मन पर पड़ता है। त च
मंत्र विज्ञान का अद्भुत प्रभाव एक जर्मन (वैज्ञानिक) ने सिद्ध किया है। उसने ‘ॐ’ लेब (ॐकार) के उच्चारण से निकलने वाली ध्वनि तरंगों से उत्पन्न सूक्ष्म शक्ति का वर्णन करते नाब हुए लिखा कि यदि ‘ॐ’ का उच्चारण विधिपूर्वक किया जाए तो उससे एक दीवार फट सकती है। अतः आप स्वयं ही इन बीज मंत्रों में निहित सूक्ष्म शक्ति का अनुभव कर सकते हैं।
