ऋषिकेश का नाम ऋषिकेश कैसे पड़ा ?

एक बार ऋषिगण , राक्षसों से पीड़ित होकर भगवान के शरणापन्न हुए तो भगवान् द्रवित हो गए।  उन्होंने राक्षसों का नाश किया तथा यह भूमि ऋषियों को प्रदान कर दी। इसका नाम ऋषिकेश हुआ तथा यह हिमालय की तपोभूमि के द्वार पर , किन्तु द्वार के अंदर हैं।  जब तक भक्त साधक का मस्तिष्क , मन हृदय संसार के प्रभाव गृहण करता रहता हैं , तब तक भक्त-साधक को शुद्ध सात्विक वातावरण में रहने की आवश्यकता बनी रहती हैं।  

वास्तव में अपना मन ही ऋषिकेश हैं तो अपना मन ही राक्षस नगरी। मन ही तपोभूमि हैं तथा मन ही वासनामय संसार।  जब तक मन वासनामय संसार का प्रभाव ग्रहण करता हैं , तब तक मनुष्य को तप की आवश्यकता प्रतीत होती हैं।  

ऋषिकेश का नाम ऋषिकेश कैसे पड़ा ?

कुछ मुख्य बिंदु

ऋषिकेश का नाम ‘ऋषिकेश’ कैसे पड़ा, इसके पीछे कई ऐतिहासिक, धार्मिक और पौराणिक कथाएँ हैं। ये कुछ प्रमुख कारण हैं:

भगवान विष्णु का नाम: ऋषिकेश भगवान विष्णु का एक नाम है, जिसका अर्थ है “इंद्रियों के स्वामी”। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने यहाँ प्रकट होकर ऋषियों को दर्शन दिए थे, इसलिए इस स्थान का नाम ऋषिकेश पड़ा।

ऋषि रैभ्य की कथा: प्राचीन कथाओं के अनुसार, ऋषि रैभ्य ने यहां घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें यहाँ ‘ऋषिकेश’ के रूप में दर्शन दिए, जिससे इस स्थान का नाम ऋषिकेश पड़ा।

पवित्र स्थान: ऋषिकेश को हिंदू धर्म में एक पवित्र स्थान माना जाता है, जहां यमुना और गंगा नदियाँ बहती हैं। इस धार्मिक महत्त्व के कारण इसे ऋषिकेश नाम दिया गया।

योग और आध्यात्म का केंद्र: ऋषिकेश को ‘योग की राजधानी’ भी कहा जाता है। यहाँ पर प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनि तपस्या और ध्यान करते आए हैं, जिससे इसका नाम ‘ऋषि’ और ‘ईश’ मिलकर ‘ऋषिकेश’ हो गया।

पुराणों में उल्लेख: स्कंद पुराण और अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी इस स्थान को ‘ऋषिकेश’ के नाम से जाना गया है, जो इसकी पौराणिकता और ऐतिहासिकता को दर्शाता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shopping Cart
Scroll to Top
Enable Notifications OK No thanks