Affinity: The Source of Positive Energy and Noble Actions

संसार में कुछ ही मनुष्य ऐसे होते हैं, जिनके भीतर धनात्मक आत्मीयता की भावना कूट-कूट कर भरी होती है।

आत्मीयता का अर्थ होता है – अपनी आत्मा के समीपस्थ होकर उसके दिव्य स्वरूप को समझना और उसकी सत्य आवाज को सुनना। प्रत्येक आत्मा की अपनी एक आवाज होती है, और जो व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज सुनता है, उसे यह अनुभव हो जाता है कि अन्य लोगों के भीतर भी वैसी ही समान आवाज होती है। जिस प्रकार हम अपने लिए धनात्मक व्यवहार और शुभ कर्मों की कामना करते हैं, उसी प्रकार अन्य लोग भी ऐसा ही चाहते होंगे। इस विचार को ही आत्मीयता की भावना कहते हैं, जो सकारात्मक ऊर्जा को वातावरण में फैलाती है। इसी भावना से दया, क्षमा, अहिंसा, धैर्य, विचारशीलता आदि सद्गुणों का उद्भव होता है।

जिनके मन, मस्तिष्क और चित्त में आत्मीयता नहीं होती, उनमें ये सद्गुण कभी भी अंकुरित नहीं हो सकते। ऐसे लोग विकार, वासना और अहंकार का बोझ लेकर अपना अस्त-व्यस्त जीवन व्यतीत करते हैं।

आत्म-प्रेमी व्यक्ति सभी आत्माओं को अपने समान समझता है। जिस प्रकार उसे स्वयं के सुख की कामना होती है, उसी प्रकार वह दूसरों के सुख का भी विचार करता है और उनके साथ धनात्मक समन्वय स्थापित करता है। वह “कर भला तो हो भला” के सिद्धांत पर जीवन व्यतीत करता है।

इसलिए, सुख और शांति प्राप्त करने के लिए जब वह यत्न करता है, तो अपने तन-मन से प्रयास करता है कि उसके कारण किसी को भी दुःख न पहुंचे। ऐसे व्यक्ति सकाम कर्म करते हुए भी शुभ कर्म ही करते हैं। यही सकाम कर्म, शुभ कर्म कहलाता है, जो सत्वगुण से संपन्न होता है।

जहाँ कर्तव्य का बोध होता है और अपनत्व की भावना रहती है, वहाँ दुःख बहुत कम होता है। जो दुःख प्रारब्ध संस्कारों के कारण होता है, वह केवल सकामता-वश भोगों की अति करने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है।

इस प्रकार, सकाम कर्म दो प्रकार के होते हैं – एक जो शुभ कर्म बनता है और दूसरा जो अशुभ कर्म का रूप लेता है।

महत्वपूर्ण बिंदु

  1. आत्मीयता का अर्थ – आत्मा के दिव्य स्वरूप को समझना और उसकी सत्य आवाज को सुनना।
  2. सकारात्मक ऊर्जा – आत्मीयता की भावना से दया, क्षमा, अहिंसा, धैर्य और विचारशीलता जैसे सद्गुण विकसित होते हैं।
  3. आत्मीयता की पहचान – जो अपनी आत्मा की आवाज सुनता है, वह दूसरों की आत्मा को भी अपने समान समझता है।
  4. नकारात्मकता का प्रभाव – जिनमें आत्मीयता नहीं होती, वे विकार, वासना और अहंकार से ग्रस्त रहते हैं।
  5. आत्म-प्रेमी व्यक्ति का दृष्टिकोण – वह अपने साथ-साथ दूसरों के सुख का भी विचार करता है और धनात्मक समन्वय स्थापित करता है।
  6. कर्तव्य और अपनत्व – जहाँ कर्तव्य का बोध और अपनत्व की भावना होती है, वहाँ दुःख न्यूनतम होता है।
  7. सकाम कर्म के प्रकार – सकाम कर्म दो प्रकार के होते हैं – शुभ कर्म (सत्वगुण संपन्न) और अशुभ कर्म (विकारों से प्रेरित)।
  8. शुभ कर्म का प्रभाव – जो व्यक्ति दूसरों को दुखी किए बिना कार्य करता है, वह सकाम कर्म करते हुए भी शुभ कर्म करता है।
  9. शांति और सुख की प्राप्ति – आत्मीयता से परिपूर्ण व्यक्ति “कर भला तो हो भला” के सिद्धांत पर चलता है और शांति प्राप्त करता है।

निष्कर्ष:

  • कंप्यूटर कभी भी मानव मस्तिष्क की दिव्य क्षमताओं की बराबरी नहीं कर सकता।
  • मानव मस्तिष्क एक चमत्कारी चेतन यंत्र है, जो ऊर्जा और चेतना के संयुक्त प्रभाव से कार्य करता है।
Shopping Cart
Scroll to Top
Enable Notifications OK No thanks