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ज्ञान और प्रारब्ध: अधिकार का सिद्धांत
एक मुर्ख इंसान संसार भर की सारी पुस्तकें लेकर भले ही अपने पुस्तकालय में रख लें , परन्तु वह केवल उन्ही को पढ़ सकेगा , जिनको पढ़ने का वह उसके प्रारब्धानुसार एवं संस्कार अनुसार वह अधिकारी होगा उन्हें वह अधिकार कर्म के सिद्धांत , प्रारब्ध द्वारा ही प्राप्त होता हैं।
कुछ मुख्य बिंदु
- पुस्तकों का संग्रह पर्याप्त नहीं – केवल पुस्तकों को संग्रहित करना ज्ञान प्राप्ति का आधार नहीं है।
- पढ़ने की योग्यता प्रारब्ध से तय – व्यक्ति वही ज्ञान प्राप्त कर सकता है जिसके लिए उसका प्रारब्ध और संस्कार उसे योग्य बनाते हैं।
- कर्म का सिद्धांत – ज्ञान-अधिकार कर्म और प्रारब्ध के नियमों से निर्धारित होता है।
- मुर्खता और ज्ञान का भेद – ज्ञान की वास्तविक प्राप्ति संस्कार और योग्यता पर निर्भर करती है, न कि भौतिक संग्रह पर।
- सच्चा ज्ञान-अधिकार – केवल कर्मशील और योग्य व्यक्ति ही सच्चे ज्ञान का अधिकारी होता है।
