Scientific Basis of Yantras and Mantras for Prosperity and Peace

समृद्धि और शांति के लिए यंत्र-मंत्र का वैज्ञानिक आधार

” सहज, शुद्ध सात्विक, अध्यात्मिक यंत्र-मंत्र की सूक्ष्म उर्जा की तरंगें प्राप्त कर सुख समृद्धि और शान्ति प्राप्त करने का वैज्ञानिक आधार ??
(नवरात्री में स्थापित कर पूजन करें और स्थाई सुख समृद्धि प्राप्त करें,यह अनुभूत है)

“हमारे 81000 सोनकादि दिव्य ऋषियों ने अपने हजारों वर्ष के दिव्य अनुसन्धान,अन्वेषण के बाद इस ब्रह्मांड के संबंध में हजारों हजार सूक्ष्म शक्तियों का पता लगाया और उसे अंतिम परम सत्य तक पहुंच गए, जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति ,पालन (निर्माण), संहार का कारक तत्व है। आध्यात्मिक विज्ञान की उत्पत्ति इसी दिव्य ब्रह्मज्ञान से हुई है।
जिस तत्व दिव्य ज्ञान, ब्रह्म दिव्य ज्ञान, शिव दिव्य ज्ञान, परम परमात्मा ज्ञान कहा जाता है।
इस परम तत्व से उत्पन्न होने वाले ब्रह्मांड एक विशेष कम्पन प्रकम्पन का पावर सर्किट की क्रिया -प्रतिक्रिया नियंत्रित कर रहा है।

इस पावर सर्किट में सूक्ष्म ऊर्जा तरंगे उत्पन्न हो रही है, जैसा पावर सर्किट इस ब्रह्मांड का है वैसा ही सर्किट प्राकृतिक इकाई का याने प्राणी(यूनिट) का भी विद्यमान है, चाहे वह पृथ्वी हो, सूर्य, चांद हो और मंडलों या निहारिका हो, वैसे ही पावर सर्किट प्रत्येक मनुष्य वनस्पति, प्रत्येक कीटाणु प्रत्येक परमाणु का होता है और सब एक दूसरे से पारस्परिक जुड़े होते हैं।

ठीक उसी प्रकार किसी जीव से कोशाणु (Cell) के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं।
ब्रह्मांड की एवं उसमें निहित जड़त्व, चेतन के इस सर्किट की कार्य प्रणाली स्वतः एक सुपर डुपर कंप्यूटर की भांन्ती कार्य करती रहती है।

जब कोई पावर सर्किट बनेगा तो वह क्रिया भी करेगा और प्रतिक्रिया भी करेगा, क्योंकि पावर सर्किट ऊर्जा धाराओं से बनती है और ऊर्जा तरंगें हमेशा सक्रिय रहती है। इसलिए उपरोक्त सर्किट भी कार्य करता है और पिंड में और ब्रह्मांड में एक ही पद्धति से काम होता रहता है।
यही क्रिया से यंत्र मंत्र विज्ञान में कार्य करती है।
यंत्र और मंत्र के प्रयोगों से चमत्कार होतै हैं।

यह चमत्कार का कारण वातावरण उत्पन्न नहीं होता है बल्कि यह सूक्ष्म तरंगों के कारण होता है ।
भौतिक विज्ञान वादी सृष्टि के मूल में परमाणु को देखते हैं और हमारे दिव्य ऋषियों ने सृष्टि के प्रत्येक स्वरूप में किस ना किसी विशेष सूक्ष्मतिसूक्ष्म दिव्य शक्ति के रूप में दर्शन कुण्डलिनी के माध्यम से की है। उस सूक्ष्म शक्ति के ज्यामितीय आकृति रुप यन्त्र से सृष्टिक्रम या सृष्टि के छिपे हुए संपूर्ण स्वरूप का बोध होता है.
रूप ही अपनी सूक्ष्म अभिव्यक्ति में ध्वनि है और स्थूल अभिव्यक्ति में यंत्र है, दोनों वास्तव में एक ही तत्व हैं। दोनों वाह्य रूप में “यंत्र -मंत्र” भिन्न-भिन्न अवश्य प्रतीत होते हैं, किंतु वास्तव में एक दूसरे के पूरक और निरन्तर उर्जा दायक है।

यंत्र का विश्लेषण करने पर किसी मंत्र के रूप में अनुभव किया जा सकता है और इसी प्रकार कोई भी मंत्र निर्दिष्ट यंत्र के रूप में देखा जा सकता है।

इन तत्वों की पुष्टि इस वैज्ञानिक निष्कर्ष भी होती है कि प्रत्येक ध्वनि एक प्रकार से ज्यामिति आकृति का निर्माण करती है , यंत्र भी संबंधित देवता,भगवान के रूप में अपनी सूक्ष्मातिसूक्ष्म ज्यामिताय अभिव्यक्ति है।
ताम्र, पीतल,चांदी सोना आदि धातु ऊर्जा के अच्छे संचालक होते हैं।

यह मन्त्रों की सूक्ष्म शक्ति चुंबकीय तरंगों को तत्काल ग्रहण कर संबंधी देवताओं,भगवान को आकर्षित कर आकाश तत्त्व के
माध्यम से स्थानांतरित कर देते हैं दैवता, भगवान अपनी आकृति के अनुसार भी उन्हें ग्रहण करते हैं और भक्तों की समस्याओं का समाधान तत्काल पूर्ण करते हैं।

“यही सहज, शुद्ध सात्विक, अध्यात्मिक यंत्र और मंत्र का वैज्ञानिक आधार है।”

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