धर्म संप्रदाय में राजनीती का प्रभाव

आजकल धर्म , सम्प्रदाय और पंथ में राजनीती का प्रभाव अत्यधिक बढ़ रहा हैं।  मनुष्य ने अपने पीछे अधिक से अधिक जन-समुदाय को आकर्षित करने की प्रवृत्ति एवं वृत्ति पनप रही हैं।  

जिस प्रकार आज राजनीति में भी हर व्यक्ति अलग – अलग सत्ता स्वार्थवश कड़ी कर रहा हैं, उसी प्रकार धर्म के नाम पर भी अपना नया – सम्प्रदाय बना लेना चाहता हैं।  इसके एक नए सिद्धांत की आवश्यकता होती हैं।  पुरानी शराब ही नई बोतलों में भरी जाती हैं। पुराने घर को ही नया रूप रंग दिया जाता हैं। फिर नए-पुराने के अंतर को दर्शाने के लिए साहित्य की रचना की जाती हैं , युक्तियाँ तलाशी जाती है , प्रवचन तथा आयोजन किए जाते है , तथा लोगों को अधिक से अधिक लुभाने का प्रयत्न किया जाता हैं , यही कलयुग हैं। यह चक्र इसी प्रकार घूमता रहता हैं। जन कल्याण का आश्वासन दिया जाता हैं , किन्तु जन- समुदाय को अकल्याण के अंधे कुएँ में धकेला जाता हैं।  

इसमें कोई न्याय तथा सशक्त आधार , नियम नहीं होकर , सिर्फ संगठन क्षमता ही होती है।  कभी उस सम्प्रदाय के विकार सामने आने लगते हैं, फिर उनमें भी फूट पड़ जाती हैं। उसके भी एक के पश्चात एक कई विभाजन होते चले जाते हैं , फिर अन्ततः सम्प्रदाय पूर्ण रूपेण दम तोड़ देता हैं।  

कुछ मुख्य बिंदु

यहाँ धर्म और सम्प्रदाय में राजनीति के प्रभाव पर कुछ संक्षिप्त बिंदु दिए गए हैं:

  1. राजनीतिक हस्तक्षेप में वृद्धि: धर्म और सम्प्रदायों में राजनीति का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, जिससे उनकी कार्यशैली प्रभावित होती है।
  2. समुदाय आकर्षण की प्रवृत्ति: कई लोग धर्म में अपने बड़े अनुयायियों का समूह बनाने की इच्छा रखते हैं, जो निजी महत्वाकांक्षा से प्रेरित होती है।
  3. नए सम्प्रदायों का उदय: जैसे राजनीति में नए दल बनते हैं, वैसे ही धर्म में नए सम्प्रदाय स्वार्थवश बनते हैं।
  4. पुरानी मान्यताओं की पुनर्पैकेजिंग: पुराने सिद्धांतों को नए रूप में पेश किया जाता है, जैसे पुरानी शराब को नई बोतल में भरना।
  5. साहित्य और कथानक का निर्माण: नए सम्प्रदाय स्वयं को भिन्न दिखाने के लिए विशेष साहित्य और कथानक तैयार करते हैं।
  6. जनता को आकर्षित करने का प्रयास: प्रवचन, आयोजन, और समारोह के माध्यम से लोगों को प्रभावित किया जाता है।
  7. कल्याण का आश्वासन: धार्मिक नेता अक्सर जन कल्याण का आश्वासन देते हैं, लेकिन परिणाम उल्टा हो सकता है।
  8. नए सिद्धांतों का अभाव: इन सम्प्रदायों में आमतौर पर नए और सशक्त सिद्धांत नहीं होते, बल्कि संगठन कौशल पर निर्भर होते हैं।
  9. आंतरिक संघर्ष और विभाजन: समय के साथ सम्प्रदायों में आंतरिक संघर्ष उत्पन्न होते हैं, जिससे विभाजन होते हैं।
  10. अंततः सम्प्रदाय का पतन: ठोस आधार न होने के कारण, ये सम्प्रदाय धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं।
  11. आकर्षण और मोहभंग का चक्र: यह चक्र निरंतर चलता रहता है, नए सम्प्रदाय बनते हैं, थोड़े समय में लोकप्रिय होते हैं, फिर विलुप्त हो जाते हैं।

 

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