सृष्टि,दुनिया में केवल शक्ति सम्पन्न होने मात्र से ही कोई भी पूज्यनीय और वन्दनीय नहीं बन जाता है अपितु उस शक्ति का सही प्रयोग और समय पर प्रयोग करने वालों को ही युगों – युगों तक स्मरण रखा जाता है। केवल सामर्थ्यवान होना पर्याप्त नहीं है अपितु उस सामर्थ्य को लोक मंगल एवं लोक कल्याण में लगाना ही जीवन की परम श्रेष्ठता एवं सार्थकता है।
अथाह शक्ति सम्पन्न होने पर भी माँ दुर्गा ने अपनी सामर्थ्य का प्रयोग कभी भी किसी निर्दोष को दण्डित करने हेतु नहीं किया बल्कि केवल और केवल आसुरी वृत्तियों के नाश के लिए ही किया।शक्ति का गलत दिशा में प्रयोग ही तो पाप है।
साधन शक्ति सम्पन्न हो जाने पर कायर बनकर चुप बैठ जाना यह भी एक प्रकार से असुरत्व को बढ़ाने जैसा ही है। अपनी समस्त शक्ति व साधनों को परमार्थ , परोपकार, सर्व कल्याण, मानवता, इंसानियत की रक्षा में लगाने की प्रेरणा हमें माँ जग जननी भगवती से लेनी होगी।
महत्वपूर्ण बिंदु
शक्ति का सही प्रयोग: केवल शक्ति सम्पन्न होना ही किसी को पूज्यनीय नहीं बनाता, बल्कि उस शक्ति का सही दिशा में और समय पर प्रयोग करने वालों को ही युगों तक याद किया जाता है।
सामर्थ्य का लोक कल्याण में प्रयोग: सामर्थ्य का उपयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि लोक मंगल और लोक कल्याण में किया जाना चाहिए। यह जीवन की परम श्रेष्ठता और सार्थकता है।
माँ दुर्गा का आदर्श: माँ दुर्गा ने अपनी अथाह शक्ति का प्रयोग कभी भी निर्दोषों को दण्डित करने के लिए नहीं किया, बल्कि केवल आसुरी वृत्तियों के नाश के लिए किया। यह दिखाता है कि शक्ति का गलत दिशा में प्रयोग पाप है।
साधन शक्ति का दुरुपयोग: साधन शक्ति सम्पन्न होने के बावजूद यदि कोई कायर बनकर चुप बैठा रहता है, तो यह असुरत्व को बढ़ाने जैसा है।
परमार्थ और परोपकार: हमें अपनी समस्त शक्ति और साधनों का उपयोग परमार्थ, परोपकार, सर्व कल्याण, मानवता, और इंसानियत की रक्षा में करना चाहिए। यह प्रेरणा हमें माँ भगवती से लेनी चाहिए।
