पंचतत्व, चेतना और नवरात्रि में आत्मविकास का मार्ग
“मनुष्य जीवन दो प्रकार से सूक्ष्म रूप से जन्म और मृत्यु के बीच जीवन
संचालित होता है|
प्रथम तो पांच तत्वों से निर्मित भौतिक जीवन है|
इसका अर्थ यह है कि मनुष्य जीवन के लिए इन पांच तत्वों के निहात जरूरत होती है|
यह तत्व पृथ्वी,जल,वायु, अग्नि आकाश है|
मनुष्य पृथ्वी से आहार पृथ्वी से ग्रहण करता है, इसके बाद जल, पावक से ऊर्जा , गगन से शब्द वायु से प्राण वायु लेता है, तो इसका जीवन निरन्तर संचालित होता है. इन पांच तत्वों का ऋण मनुष्य को ऊपर जन्म से लेकर अन्तिम जीवन तक होता है और तो इन दिव्य तत्वों की समृद्धि के लिए हर एक मनुष्य का कर्तव्य की इन पांच तत्वों का उपभोग के साथ संरक्षण भी करें |
मनुष्य चेतना शक्ति के रूप में जीवन जीता है|
मन चित्त होने के कारण ही मनुष्य की मानव उपाधि मिलती है जो अन्य जीवों को नहीं मिलती है. जो मन,चित्त, मष्तिष्क को सशक्त नहीं बनाते है वे इस संसार में बोझ बनकर जीते हैं, पशुओं की तरह जीते है, हमें मन,चित्त, मष्तिष्क को मानुष याने सत्व गुणी बनाने के लिए ऋषि ,मुनियों ,महापुरुषों, सद गुरुयों ने अनेक अनेक उपाय बताएं हैं,जिसमें पूजा पाठ, भक्ति जप तप,ध्यान, व्रत उपवास तथा ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समय प्रबंधन को शामिल कर के इस नवरात्रि में हमें इसकी शुरुआत करना चाहिए|
यह अनुभूत है |
महत्वपूर्ण बिंदु
- मनुष्य जीवन दो रूपों में संचालित होता है – भौतिक (पंचतत्व से बना शरीर) और सूक्ष्म (चेतना/मन/चित्त)।
- पंच तत्वों का महत्व –पृथ्वी (आहार), जल, वायु (प्राणवायु), अग्नि (ऊर्जा), आकाश (शब्द)।
मनुष्य का जीवन इन तत्वों पर आधारित है। - पंचतत्वों का ऋण – जन्म से मृत्यु तक मनुष्य इन तत्वों का उपभोग करता है, इसलिए उनका संरक्षण और सम्मान करना कर्तव्य है।
- चेतना ही मानवता की पहचान है – मन, चित्त और मस्तिष्क से ही मनुष्य “मानव” कहलाता है।
- जो मनुष्य चेतना का विकास नहीं करता, वह जीवन को केवल बोझ की तरह जीता है – पशु समान।
- मानवता और चेतना के विकास के उपाय – ऋषि-मुनियों व सद्गुरुओं ने बताए उपाय:
पूजा-पाठ, भक्ति, जप-तप, ध्यान, व्रत-उपवास, ब्रह्म मुहूर्त में उठना, समय का प्रबंधन आदि। - नवरात्रि एक श्रेष्ठ अवसर है –आत्मविकास और चेतना को सशक्त बनाने की शुरुआत करने के लिए।
