Post Views: 363
ईश्वर और लक्ष्मी जी की कृपा में बड़ा अंतर हैं। ईश्वर स्वतंत्र होकर जीव निर्जीव को उनके कर्म के अनुसार दण्ड देने वाले भी हैं। इसलिए कृपा हमेशा उनके ईश्वर के बस में नहीं रह सकती।
किन्तु महालक्ष्मी केवल दयामूर्ति हैं। दण्डनीय बुद्धि उनमे स्वप्न में भी नहीं आती माँ लक्ष्मी दया का महान अवतार मानी जाती हैं , क्योंकि लक्ष्मी अपनी कृपा संसार के प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति पर रखती हैं। माँ लक्ष्मी भगवान नारायण को समझा बुझाकर “मेरे भक्त अपराधी नहीं हैं कहती हुई संसार के समस्त मनुष्यों पर धन की कृपा करती हैं। “
कुछ मुख्य बिंदु
यहाँ महालक्ष्मी की कृपा और उनके दयामय स्वरूप पर कुछ संक्षिप्त बिंदु दिए गए हैं:
- ईश्वर और लक्ष्मी की कृपा में अंतर: ईश्वर न्यायप्रिय होते हैं और कर्म के अनुसार दंड देते हैं, जबकि लक्ष्मी जी केवल दयामूर्ति हैं।
- महालक्ष्मी का दयालु स्वरूप: महालक्ष्मी के स्वभाव में दंड देने का भाव नहीं है; वे हमेशा दया की प्रतिमूर्ति मानी जाती हैं।
- सर्वजन पर समान कृपा: महालक्ष्मी संसार के सभी प्रकार के व्यक्तियों पर अपनी कृपा बनाए रखती हैं, बिना किसी भेदभाव के।
- नारायण को मनाने का प्रयास: लक्ष्मी जी भगवान नारायण को यह कहकर मनाती हैं कि उनके भक्त दोषी नहीं हैं।
- संपूर्ण मानवता पर कृपा: महालक्ष्मी संसार के सभी लोगों पर धन की कृपा बरसाती हैं, चाहे वे किसी भी परिस्थिति में हों।
- दयामूर्ति के रूप में अवतार: माँ लक्ष्मी का अवतार दया का प्रतीक है, जो सबके लिए समर्पित है।
- लक्ष्मी जी का कृपा भाव: महालक्ष्मी का ध्यान केवल सभी पर कृपा बरसाने में होता है, किसी को दंडित करने में नहीं।
- लक्ष्मी जी का माँ स्वरूप: महालक्ष्मी को माँ कहा गया है क्योंकि वे सभी का पालन-पोषण करती हैं।
- दोष क्षमा की भावना: महालक्ष्मी अपने भक्तों की गलतियों को क्षमा करते हुए उन पर कृपा करती हैं।
अपराधियों पर भी अनुग्रह: महालक्ष्मी दयामयी हैं और अपने भक्तों के अपराधों को नजरअंदाज कर कृपा करती हैं।
