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मंत्र जप और ईश्वर सेवा से कर्म का शुद्धिकरण
मंत्र जप का अर्थ किसी मंत्र, पद , चालीसा , स्त्रोत , गुरु मंत्र का बार बार मन , चित्त में स्मरण करना अर्थात दोहराना होता हैं। जब ईश्वर की सेवा समझ कर प्रार्थना , जप-तप एवं कर्म किया जाता हैं तो कर्म का संस्कार संचय बंद हो जाता हैं अर्थात , नए प्रारब्ध का निर्माण बंद हो जाता हैं। ईश्वर सेवा समझ कर कर्तव्य बुद्धि से निरभिमान होकर किए गए कर्म का न केवल संस्कार संचय ही नहीं होता अपितु पूर्व कृत कर्मों के संचित संस्कार का श्रय होकर चित्त भी शुद्ध होता हैं।
महत्वपूर्ण बिंदु
- मंत्र जप का अर्थ – मंत्र, चालीसा, और स्त्रोत का मन, चित्त में बार-बार स्मरण करना।
- ईश्वर सेवा में कर्म – जब कर्म ईश्वर सेवा के रूप में किया जाता है, तो नए प्रारब्ध का निर्माण रुक जाता है।
- निरभिमान कर्तव्य बुद्धि – कर्तव्य के भाव से निराभिमान होकर किए गए कर्म से चित्त की शुद्धि होती है।
- संस्कार संचय का बंद होना – ईश्वर सेवा से संस्कार संचय बंद हो जाता है और पूर्वकृत कर्मों का शुद्धिकरण होता है।
- कर्म और चित्त शुद्धि – ईश्वर की सेवा से चित्त भी शुद्ध होता है, जिससे व्यक्ति का मानसिक और आत्मिक उन्नति होती है।
