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मनुष्य में उत्पन्न होने वाले रोग

सामान्यतः मनुष्य में दो प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं , एक अशुभ तथा अनुचित, अप्राकृतिक खान-पान तथा रहन-सहन के कारण दूसरे प्रारब्ध के कारण | अधिकतर रोगों का कारन अनुचित खान – पान ही होता हैं | यदि खान – पान सादा और प्राकृतिक हो तो पैदा होने वाले रोगो. पर स्वभावतः ही काबू […]

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जो सोवत है वो खोवत है ,जो जागत है वो पावत है

सामान्य मनुष्य का एक तिहाई जीवन निद्रा ,आलस्य में ही व्यतीत हो जाता है | जहाँ एक ओर जागृत अवस्था का सभी व्यवहार ईश्वर सेवा के माध्यम से परमार्थ।, परोपकार एवं कल्याण सेवा की भी अपेक्षा रखता हैं, वही निद्रा अवस्था का लम्बा समय भी सत्वगुणी मानव के लिए पर्याप्त विचारणीय हैं | निद्राकाल में

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कर भला तो हो भला , सबके भले में अपना भला , मिल बाँटकर खाओं और सभी वैकुण्ठ (Abode Of God) में जाओं

आज परिवार , अड़ोस-पड़ोस , समाज , मोहल्ले में आपस में स्वार्थ की ऋणात्मक ऊर्जा यानि कि छल कपट , ईर्ष्या-द्वेष , लोभ , लालच , संपत्ति के लिए कोर्ट बाजी , तलाक , तिगड़म बाजी , आदि का ही बोल बाला बढ़ता ही जा रहा है , आपस में भरोसा , विश्वास , समन्वयवादी

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अपने कर्म एवं कर्तव्य का पालन करते जाएँ , जीवन में सुख- शांति स्वत: मिलती जाएगी

छोटे- परिवारों में इसी कारण से जीवन की दौड़ में पीछे रह जाते है , यह विचार करे कि घर में बड़े हैं न , जिम्मेदारियों को सँभालने वाले हमारे कर्तव्य भूल कर जब हमें ठोकर लगती हैं तब हमें समझ में आता हैं ? अतः सिर्फ हमारे चाहने मात्र से सुख-शांति की प्राप्ति नहीं

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