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सुगम-दुर्गम तीर्थ, आस्था की शक्ति

हिमालय पर्वत पर कई तीर्थ हैं। तीर्थ कष्ट तथा अपमान सहन करने के उद्देश्य से विकसित किए गए हैं। अपनी शारीरिक तथा मानसिक क्षमता के अनुसार जो जितना सहन कर सके , वैसी तीर्थ यात्रा चुन सकता हैं। जिनकी सहनशीलता की क्षमता अधिक है ,तो उसे सुगम्य तीर्थों पर जाकर तपने का अवसर प्राप्त ही […]

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ऋषिकेश का नाम ऋषिकेश कैसे पड़ा ?

ऋषिकेश का नाम ऋषिकेश कैसे पड़ा ?

एक बार ऋषिगण , राक्षसों से पीड़ित होकर भगवान के शरणापन्न हुए तो भगवान् द्रवित हो गए।  उन्होंने राक्षसों का नाश किया तथा यह भूमि ऋषियों को प्रदान कर दी। इसका नाम ऋषिकेश हुआ तथा यह हिमालय की तपोभूमि के द्वार पर , किन्तु द्वार के अंदर हैं।  जब तक भक्त साधक का मस्तिष्क ,

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मनुष्य की दुविधा

मनुष्य में एक ओर शरीर के प्रति आस्तिक हैं तो दूसरी ओर वह ईश्वर को भी प्राप्त करना चाहता हैं।ईश्वर के लिए हम सारांश में कह सकते हैं कि : ईश्वर की परिभाषा हो ही नहीं सकती। उसे विचारों , भावों , आकारों तथा शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। मनुष्य अपने स्वाभाव से विवश

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आध्यात्मिकता का वाद विवाद

आजकल आध्यात्मिकता का वाद-विवाद का एक विशाल अखाडा सा ही हर जगह दृष्टिगोचर हो रहा हैं | ज्ञानी गण ईश्वर के भक्तों , साधकों की खिल्ली उड़ाते हुए देखे गए हैं। भक्त ज्ञानियों को प्रेमविहीन शुल्क वाचक ज्ञानी कहते हैं , योगी योग को एकमात्र उपाय बताते हैं तथा कर्मयोगी कर्म करने को ही ईश्वर

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आधुनिक युग की समस्या

आधुनिक युग में यह समस्या कड़ी हो गई कि अन्य मार्गों का आदर करना छोड़ दिया है। लोग अध्यात्म का कोई अनुभव हुए बिना ही गवाही देने लग जाते हैं , तथा जिन्होंने कुछ ध्यान अवस्था में अनुभव प्राप्त किए हैं , उनको झूठा कहते हैं। सभी भक्त साधक अपनी-अपनी उपासना , साधन प्रणाली को

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मनुष्य जन्म: भाग्य का उपहार

अपने भाग्य , किस्मत , नसीब को कभी भी दोष मत दीजिये , प्रारब्ध के अनुसार मनुष्य-योनि के रूप में ८४ लाख योनियों के बाद जन्म मिला हैं | यह मनुष्य का भाग्य नहीं तो क्या हैं ? मनुष्य ठोकर खाकर गिर गया , यह बताना आवश्यक नहीं हैं , यह बताना अति आवश्यक एवं

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परिवार में संस्कार

यदि हमें परिवार , समाज में धनात्मक ऊर्जा पैदा करनी है तो सर्वप्रथम हमें अपने बेटों को एक अच्छा कर्तव्य निष्ठ , सत्य गुणी , ऊर्जावान नागरिक , अच्छा भाई , अच्छा पडोसी , अच्छा पति , अच्छा दामाद और अच्छा पिता बनाने की शिक्षा घर से ही देना होगी | जिससे हम सभी एक

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मनुष्य की इच्छाएँ

मनुष्य की इच्छा (desire) तथा दुःख का परस्पर घनिष्ट सम्बन्ध हैं | जहाँ इच्छा होगी , वहाँ दुःख भी होगा | इच्छा की पूर्ति सदैव नहीं हो पाती , इच्छा की पूर्ति मनुष्य के प्रारब्ध अनुसार ही पूर्ण अथवा अपूर्ण होती हैं | इच्छा पूरी न होने पर दुःख का कारण बन जाती हैं |सेवा

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ईश्वर मंत्रिमण्डल पृथ्वी पर आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक लोकतंत्र का संचालन

शिव (राष्ट्र पिता) ईश्वरों में महा- शिव प्रतिष्ठा में सर्वोच्च शिखर पर आसीन है | भगवान शिव का व्यक्तित्व अद्वितीय हैं | वे सर्व त्यागी हैं | किसी पद और सत्ता के लोभ से सर्वदा मुक्त हैं | वे पद , मुकुट , सिंहासन , मूर्ति-पूजन तथा किसी प्रकार के वैभव के लोभ से पूर्णतः

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मनुष्य के भीतर का द्वंद्व ही असली पीड़ा है

मृत्यु स्वयं उतना कष्ट नहीं देती , जितना कि मृत्यु का भय दुखी बनाता हैं | व्यापार में घाटा हो जाने पर भी एक व्यापारी के सामने ऐसा अवसर नहीं आता कि उसे जीवन व्यापन में कठिनाइयाँ , असुविधा हो तो भी वह इतनी चिंता करता हैं कि सुखकर काँटा हो जाता हैं | उस

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