आध्यात्मिक

Sattva Guna And Character The Cause Of Joy And Sorrow In Society

सत्व गुण और चरित्र: समाज में सुख और दुःख का कारण देश के प्रत्येक घर को हम सदावर्त में भले ही परिणिति कर दें , देश को अस्पतालों में भले ही भर दे , परन्तु जब तक मनुष्य का सत्व गुण एवं चरित्र परिवर्तित नहीं होता , तब तक दुःख-क्लेश संसार में बना ही रहेगा।   […]

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Spirituality The True Foundation of Life

आध्यात्मिकता: जीवन का सच्चा आधार आध्यात्मिक ही हमारे जीवन के समस्त कर्तव्यों का सच्चा आधार हैं।  आध्यात्मिक चैतन्य -सूक्ष्म शक्ति शाली मानव चाहे तो किसी भी विषय में क्षमता सम्पन्न हो सकता है और जब तक मनुष्य में आध्यात्मिक-आत्मबल नहीं आता , तब तक उसकी भौतिक आवश्यकताएँ भी कदापि एवं भली भांति संतुष्ट , तृप्त

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Knowledge and Destiny The Principle of Entitlement

ज्ञान और प्रारब्ध: अधिकार का सिद्धांत एक मुर्ख इंसान संसार भर की सारी पुस्तकें लेकर भले ही अपने पुस्तकालय में रख लें , परन्तु वह केवल उन्ही को पढ़ सकेगा , जिनको पढ़ने का वह उसके प्रारब्धानुसार एवं संस्कार अनुसार वह अधिकारी होगा उन्हें वह अधिकार कर्म के सिद्धांत , प्रारब्ध द्वारा ही प्राप्त होता

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Virtue Altruism and Three Worlds

सद्गुण, परमार्थ और तीन लोकों की विजय जो सात्विक मनुष्य सद्गुणों का आचरण कर धन कमाता हैं और समाज की सुविधा के लिए तालाब खुदवाता हैं , वृक्ष लगाता हैं , अस्पताल खुलवाता हैं और निरंतर परमार्थ , परोपकार और जीव-निर्जीव के कल्याण में लगा रहता हैं , वह तीनों लोकों को जीत लेता हैं। 

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A Great Person Is Connected to Spirituality

महापुरुष से अध्यात्म जुड़ा हैं जहाँ किसी आश्रम , मंदिर में कोई दिव्य सद् गुरु, महापुरुष निवास करते हैं या उसके जीवन की कोई अध्यत्मिक-विशेष घटना घटित होती हैं , तो उस सद्गुरु , महापुरुष के दिव्य-शरीर से निकलने वाली सूक्ष्म-आध्यात्मिक चेतन तरंगे , वहाँ के वातावरण में फैल जाती हैं , जिसका प्रभाव लम्बे

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Just As A Devotee Becomes A Seeker They Envision Their Own Idea Of God In Their Unique Way

जिस प्रकार भक्त साधक होता हैं , वैसे ही अपने-अपने ईश्वर की कल्पना कर लेता हैं। जिस प्रकार भक्त साधक होता हैं , वैसे ही अपने-अपने ईश्वर की कल्पना कर लेता हैं।  उदाहरण के लिए यदि आप उत्तर प्रदेश में जाएँ तो भगवान कृष्ण तथा राधा जी , राम तथा सीता जी , आप को

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भगवा वस्त्र तथा तपस्वी

जो व्यक्ति भगवा वस्त्र पहन कर तपस्वी जीवन व्यतीत नहीं करता ,वह तपस्वी का वेश धारण कर लोगों को ठगता फिरता हैं।  भगवा रंग अग्नि का प्रतीक हैं , तथा अग्नि तप का पर्याय हैं।  जिस प्रकार अग्नि में कुछ डालों , भस्म हो जाता हैं , उसी प्रकार तप रुपी अग्नि में वासनाएँ ,

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महालक्ष्मी की दिव्य कृपा

ईश्वर और लक्ष्मी जी की कृपा में बड़ा अंतर हैं।  ईश्वर स्वतंत्र होकर जीव निर्जीव को उनके कर्म के अनुसार दण्ड देने वाले भी हैं।  इसलिए कृपा हमेशा उनके ईश्वर के बस में नहीं रह सकती।   किन्तु महालक्ष्मी केवल दयामूर्ति हैं।  दण्डनीय बुद्धि उनमे स्वप्न में भी नहीं आती माँ लक्ष्मी दया का महान अवतार

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अध्यात्म की राह, मन की बंदिश

अध्यात्म बड़ा आसान हैं किन्तु हृदय , मन चित्त तथा संसार ने मिलकर इसे जटिल बना दिया हैं केवल हृदय ,मन और चित्त को संसार से मोड़ना ही तो अध्यात्म हैं।   बुल्लेशाह ने यही बात अपने गुरूजी से पूछी तो उन्होंने कहा कि, “भगवान् को प्राप्त करने में क्या कठिनाई हैं ? हृदय , मन

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श्री राम द्वारा दिखाया गया मार्ग

आज प्रभु राम की वंदना करने के साथ साथ यह भी आवश्यक है कि हम उनके दिखाए “दिव्य एवं धनात्मक” मार्ग पर निरंतर चले।   प्रभु राम भारतीय संस्कृति में धर्म , सत्य , शौर्य , शील संयम , विनम्रता , मर्यादा आदि गुणों के दिव्य-प्रतीक हैं।  इन गुणों के कारन ही हम उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम

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